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उसका गुज़रना पास से मेरे!
नज़र नीची किए उसका गुज़रना पास से मेरे, ज़रा सी देर रुकना फिर सबा-रफ़्तार हो जाना| मुनव्वर राना
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ख़ुद-मुख़्तार हो जाना!
मोहब्बत इक न इक दिन ये हुनर तुमको सिखा देगी, बग़ावत पर उतरना और ख़ुद-मुख़्तार हो जाना| मुनव्वर राना
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अब भी कोई ख़्वाब लगता है!
कहानी का ये हिस्सा अब भी कोई ख़्वाब लगता है, तिरा सर पर बिठा लेना मिरा दस्तार हो जाना| मुनव्वर राना
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उसके लिए दुश्वार हो जाना!
बहुत दुश्वार है मेरे लिए उसका तसव्वुर भी, बहुत आसान है उसके लिए दुश्वार हो जाना| मुनव्वर राना
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आपका दीवार हो जाना!
कभी जब आँधियाँ चलती हैं हमको याद आता है, हवा का तेज़ चलना आपका दीवार हो जाना| मुनव्वर राना
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आपका अख़बार हो जाना!
वो अपना जिस्म सारा सौंप देना मेरी आँखों को, मिरी पढ़ने की कोशिश आपका अख़बार हो जाना| मुनव्वर राना
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मिरा बीमार हो जाना!
किसी दिन मेरी रुस्वाई का ये कारन न बन जाए, तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना| मुनव्वर राना
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वो आपका गुलनार हो जाना!
ख़फ़ा होना ज़रा सी बात पर तलवार हो जाना, मगर फिर ख़ुद-ब-ख़ुद वो आपका गुलनार हो जाना| मुनव्वर राना
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माशो की माँ!
हिन्दी में हास्य व्यंग्य के एक प्रमुख कवि हैं श्री अशोक चक्रधर जी, लेकिन आज मैं उनकी जो कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ वह हास्य-व्यंग्य की नहीं अपितु अत्यंत भावपूर्ण कविता है, जो टमाटर बेचने वाली एक वृदधा के बारे में लिखी गई है| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह भावपूर्ण…
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मगर आदमी अच्छा भी नहीं!
मुँह से हम अपने बुरा तो नहीं कहते कि ‘फ़िराक़’, है तिरा दोस्त मगर आदमी अच्छा भी नहीं| फ़िराक़ गोरखपुरी