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तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ!
मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ, ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ| बशीर बद्र
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तुझे आइने में उतार लूँ!
अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें सँवार लूँ, मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ| बशीर बद्र
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तितली!
आज सोचा था कि अपने अग्रज और गुरु तुल्य स्वर्गीय डॉक्टर कुंअर बेचैन जी का एक गीत शेयर करूंगा, उनके बहुत से गीत मैंने पहले भी शेयर किए हैं और वे मुझे अत्यंत प्रिय हैं| लेकिन आज मेरी निगाह पड़ी कुंअर रवींद्र जी की एक रचना पर, सोचा आज इस रचना को ही शेयर कर…
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सहता है बग़ावत नहीं करता!
दुनिया में ‘क़तील’ उस सा मुनाफ़िक़ नहीं कोई, जो ज़ुल्म तो सहता है बग़ावत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता!
इंसान ये समझें कि यहाँ दफ़्न ख़ुदा है, मैं ऐसे मज़ारों की ज़ियारत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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औरों को नसीहत नहीं करता!
भूला नहीं मैं आज भी आदाब-ए-जवानी, मैं आज भी औरों को नसीहत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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कोई मलामत नहीं करता!
घर वालों को ग़फ़लत पे सभी कोस रहे हैं, चोरों को मगर कोई मलामत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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किसी से भी रिआ’यत नहीं करता!
क्यूँ बख़्श दिया मुझसे गुनहगार को मौला, मुंसिफ़ तो किसी से भी रिआ’यत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई
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अपनी वकालत नहीं करता!
पकड़ा ही गया हूँ तो मुझे दार पे खींचो, सच्चा हूँ मगर अपनी वकालत नहीं करता| क़तील शिफ़ाई