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टूटा है जोड़ दूँगा उसे!
कहीं अकेले में मिलकर झिंझोड़ दूँगा उसे, जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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मकान!
आज एक बार मैं श्री रामदरश मिश्र जी की रचनाएं शेयर कर रहा हूँ| असल में यहाँ उन्होंने एक ही शीर्षक ‘मकान’ से चार कविताएं लिखी हैं|लीजिए आज प्रस्तुत हैं श्री रामदरश मिश्र जी की ये सुंदर रचनाएं – एक चिड़िया फिर टाँग गयी है तिनकेघोंसला बनाने के लिएऔर मैं फिर उजाड़ दूँगामैं कितना असहाय…
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लीजे मुलाक़ात हो गई!
वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस, उससे भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई| निदा फ़ाज़ली
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पर्दे खींच दिए रात हो गई!
सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा, खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई| निदा फ़ाज़ली
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कहीं शराब पिएँ रात हो गई!
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई, आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई| निदा फ़ाज़ली
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औरों को समझाएँगे!
किन राहों से सफ़र है आसाँ कौन सा रस्ता मुश्किल है, हम भी जब थक कर बैठेंगे औरों को समझाएँगे| निदा फ़ाज़ली
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जिस दिन धोका खाएँगे!
अच्छी सूरत वाले सारे पत्थर-दिल हों मुमकिन है, हम तो उस दिन राय देंगे जिस दिन धोका खाएँगे| निदा फ़ाज़ली
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चार किताबें पढ़ कर ये भी-
बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़ कर ये भी हम जैसे हो जाएँगे| निदा फ़ाज़ली
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वर्ना घर खो जाएँगे!
तुम जो सोचो वो तुम जानो हम तो अपनी कहते हैं, देर न करना घर आने में वर्ना घर खो जाएँगे| निदा फ़ाज़ली