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पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे!
आज मैं हिन्दी के प्रतिष्ठित नवगीतकार श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|लीजिए आज प्रस्तुत है श्री ठाकुर प्रसाद सिंह जी का यह नवगीत – पात झरे, फिर-फिर होंगे हरे साखू की डाल पर उदासे मनउन्मन का क्या होगापात-पात पर अंकित चुम्बनचुम्बन का क्या होगामन-मन पर डाल दिए बन्धनबन्धन का…
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इक समुंदर कह रहा था-
मैंने अपनी ख़ुश्क आँखों से लहू छलका दिया, इक समुंदर कह रहा था मुझको पानी चाहिए| राहत इंदौरी
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ठोकर लगानी चाहिए!
ज़िंदगी है इक सफ़र और ज़िंदगी की राह में, ज़िंदगी भी आए तो ठोकर लगानी चाहिए| राहत इंदौरी
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तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए!
मेरी क़ीमत कौन दे सकता है इस बाज़ार में, तुम ज़ुलेख़ा हो तुम्हें क़ीमत लगानी चाहिए| राहत इंदौरी
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थोड़ी धूप आनी चाहिए!
मैंने ऐ सूरज तुझे पूजा नहीं समझा तो है, मेरे हिस्से में भी थोड़ी धूप आनी चाहिए| राहत इंदौरी
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दुश्मन ख़ानदानी चाहिए!
सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए, ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझको ख़ानदानी चाहिए| राहत इंदौरी
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ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे!
मज़ा चखा के ही माना हूँ मैं भी दुनिया को, समझ रही थी कि ऐसे ही छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे!
पसीने बाँटता फिरता है हर तरफ़ सूरज, कभी जो हाथ लगा तो निचोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे!
बदन चुरा के वो चलता है मुझ से शीशा-बदन, उसे ये डर है कि मैं तोड़ फोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी
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इरादा किया था कि छोड़ दूँगा उसे!
मुझे वो छोड़ गया ये कमाल है उसका, इरादा मैंने किया था कि छोड़ दूँगा उसे| राहत इंदौरी