Category: Uncategorized
-
गुज़र जाए ख़बर लगता है!
चाँद का ख़्वाब उजालों की नज़र लगता है, तू जिधर हो के गुज़र जाए ख़बर लगता है| वसीम बरेलवी
-
मैं तो वही खिलौना लूँगा!
आज मैं अपने जमाने में हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि रहे स्वर्गीय सियाराम शरण गुप्त जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में बाल हठ दिखाया गया है एक साधारण बालक का और एक राजकुमार का, जिनको दोनों को एक दूसरे के खिलौने पसंद आते हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सियाराम शरण…
-
पार उतर जाएँ हम तो क्या!
दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र, दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
-
लौट के घर जाएँ हम तो क्या!
अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ, शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
-
जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या!
हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने, इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
-
गुज़र जाएँ हम तो क्या!
ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या, दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या| मुनीर नियाज़ी
-
तंगी में उसको शराब क्या देते!
शराब दिल की तलब थी शरा के पहरे में, हम इतनी तंगी में उसको शराब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
-
एक ही घर का अज़ाब क्या देते!
हवा की तरह मुसाफ़िर थे दिलबरों के दिल, उन्हें बस एक ही घर का अज़ाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
-
बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में!
ख़राब सदियों की बे-ख़्वाबियाँ थीं आँखों में, अब इन बे-अंत ख़लाओं में ख़्वाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी
-
अपने अमल का हिसाब क्या देते!
किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते, सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते| मुनीर नियाज़ी