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महताब मत देखा करो!
आशिक़ी में ‘मीर’ जैसे ख़्वाब मत देखा करो, बावले हो जाओगे महताब मत देखा करो| अहमद फ़राज़
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ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता!
पागल हुए जाते हो ‘फ़राज़’ उससे मिले क्या, इतनी सी ख़ुशी से कोई मर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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बिछड़ने का डर भी नहीं जाता!
दिल को तिरी चाहत पे भरोसा भी बहुत है, और तुझसे बिछड़ जाने का डर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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अब ध्यान उधर भी नहीं जाता!
वो राहत-ए-जाँ है मगर इस दर-बदरी में, ऐसा है कि अब ध्यान उधर भी नहीं जाता | अहमद फ़राज़
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ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से!
आँखें हैं कि ख़ाली नहीं रहती हैं लहू से, और ज़ख़्म-ए-जुदाई है कि भर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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फ़ैसला कर भी नहीं जाता!
क़ुर्बत भी नहीं दिल से उतर भी नहीं जाता, वो शख़्स कोई फ़ैसला कर भी नहीं जाता| अहमद फ़राज़
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हमसे ख़ुदाई भी खफ़ा हो जाए!
बहुत दिनों से फिल्मों से जुड़ी कोई रचना मैंने शेयर नहीं की है, केवल अन्य साहित्यिक रचनाएं शेयर करता रहा हूँ| आज से सोचता हूँ कि कुछ दिन फिल्मों से जुड़ी कुछ रचनाएं शेयर करूंगा| आज शेयर कर रहा हूँ साहिर लुधियानवी जी के लिखे एक फिल्मी गीत से, जो पुरानी फिल्म- ‘लैला मजनू’ में…