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जनता का दुलारा – शैलेन्द्र!
फिल्म संगीत से जुड़ी पोस्ट्स शेयर करने के क्रम में आज पुनः प्रस्तुत है जनकवि शैलेन्द्र जी पर पहले लिखी गई यह पोस्ट| आज ऐसे ही, गीतकार शैलेंद्र जी की याद आ गई। मुझे ये बहुत मुश्किल लगता है कि किसी की जन्मतिथि अथवा पुण्यतिथि का इंतज़ार करूं और तब उसको याद करूं। मैंने कहीं…
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तिरी याद न जाने निकल आए!
एक ख़ौफ़ सा रहता है मिरे दिल में हमेशा, किस घर से तिरी याद न जाने निकल आए| मुनव्वर राना
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बहुत आगे ज़माने निकल आए!
अब तेरे बुलाने से भी हम आ नहीं सकते, हम तुझ से बहुत आगे ज़माने निकल आए| मुनव्वर राना
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भिगोने के बहाने निकल आए!
ऐ रेत के ज़र्रे तिरा एहसान बहुत है, आँखों को भिगोने के बहाने निकल आए| मुनव्वर राना
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हम घर से कमाने निकल आए!
मुमकिन है हमें गाँव भी पहचान न पाए, बचपन में ही हम घर से कमाने निकल आए| मुनव्वर राना
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ख़ज़ाने निकल आए!
माँ बैठ के तकती थी जहाँ से मिरा रस्ता, मिट्टी के हटाते ही ख़ज़ाने निकल आए| मुनव्वर राना
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ख़त उसके पुराने निकल आए!
अलमारी से ख़त उसके पुराने निकल आए, फिर से मिरे चेहरे पे ये दाने निकल आए| मुनव्वर राना
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आ जा रे परदेसी!!
आज मधुमती फिल्म के लिए शैलेन्द्र जी का लिखा एक फिल्मी गीत शेयर कर रहा हूँ, जिसे सलिल चौधरी जी के संगीत निर्देशन में स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर जी ने गाया था|| लीजिए आज प्रस्तुत हैं पुराने जमाने के इस सुपरहिट मधुर गीत के बोल- आ जा रे परदेसीमैं तो कब से खड़ी इस पारये…
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तिरे लब का बदल कहते हैं!
वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़, पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं| क़तील शिफ़ाई