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ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप!
ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उसकी धूप, क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बा’द| कैफ़ी आज़मी
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अक्सर घुटन के बा’द!
होंटों को सी के देखिए पछ्ताइएगा आप, हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बा’द| कैफ़ी आज़मी
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चाँद से आगे निकल गए!
दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए, ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बा’द| कैफ़ी आज़मी
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दाद-ए-सुख़न मिली मुझे-
वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बा’द, दाद-ए-सुख़न मिली मुझे तर्क-ए-सुख़न के बा’द| कैफ़ी आज़मी
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पीछे जा रहा हूँ मैं!
लंबे समय के बाद मैं आज एक बार फिर स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| एक समय था जब रंग जी को कवि सम्मेलनों में सुनना एक अलग ही प्रकार का अनुभव होता था| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी का यह गीत – जो गए…
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आहों का ज़माना है!
आग़ाज़-ए-मोहब्बत है आना है न जाना है, अश्कों की हुकूमत है आहों का ज़माना है| जिगर मुरादाबादी
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ठोकर में ज़माना है!
क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है, हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है| जिगर मुरादाबादी