बूढ़े बरगद आज तुझे!

तेरी लटों में सो लेते थे बे-घर आशिक़ बे-घर लोग,
बूढ़े बरगद आज तुझे भी काट गिराया लोगों ने।

कैफ़ भोपाली

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