ग़म-ए-रोज़गार होता!

ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है प कहाँ बचें कि दिल है,
ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता|

मिर्ज़ा ग़ालिब

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