तिरी नज़रों से गिर कर आज भी ज़िंदा हूँ मैं क्या ख़ूब,
तक़ाज़ा है ये ग़ैरत का पशेमानी से मर जाऊँ।
महशर आफ़रीदी
A sky full of cotton beads like clouds
तिरी नज़रों से गिर कर आज भी ज़िंदा हूँ मैं क्या ख़ूब,
तक़ाज़ा है ये ग़ैरत का पशेमानी से मर जाऊँ।
महशर आफ़रीदी
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