ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ!

बहुत से शे’र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर,
बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ।

महशर आफ़रीदी

One response to “ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ!”

  1. क़लम से लहू टपके तो उसे फ़न की अज़ान समझ,
    हर ज़ख़्म-ए-सुख़न को तू अपनी पहचान समझ।

    ये दर्द ही तो देता है लफ़्ज़ों को वो रूहानी असर,
    वरना यूँ ही कहाँ बनती है ग़ज़ल दिल से निकलकर।

    गर मर भी गए तुम इस इश्क़-ए-ग़ज़ल की राह में,
    तारीख़ कहेगी वो शायर था, जो जीया हर एक आह में।
    -महोदधि बा अदब

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