वहीं डाल दी हैं बाँहें!

कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता,
तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें|

मजरूह सुल्तानपुरी

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