मैं चलता!

आज एक बार फिर मैं वरिष्ठ हिंदी नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत–


मैं चलता
मेरे साथ चला करता पग-पग
वह सत्य कि जिसको पाकर
धन्य हुआ जीवन ।

मेरे समकक्ष न कोई साधु-संन्यासी
मेरी स्पर्धा सर्वदा स्वयं ईश्वर से है
उसके दर्शन की जरा नहीं चाहत मुझमें
वह कहाँ नहीं है, यही सवाल इधर से है ।

मैं जगता
मेरे साथ जगा करती धरती
मावस में चाँद-सितारों से
अधभरा गगन ।

जिस दिव्य पुरुष की प्रतिमा को पूजता जगत
वह तो अधिपति का छोटा-सा अभिकर्ता था
भूमिका निभाई उसने मात्र ‘करण’ की थी
कैसे समझाऊँ, कभी नहीं वह ‘कर्ता’ था ।

मैं पलता
मेरे साथ पला करता मोती
धर्म का, काम की सीपी में
सम्पुटित नयन ।

कर चित्रगुप्त मुर्दाघर का लेखा-जोखा
आँकना मुझे है तेरे वश की बात नहीं
हर पाप-पुण्य में मेरे, था वह साथ रहा
जिसको छू पाने की तेरी औकात नहीं

मैं ढलता
मेरे साथ ढला करता सूरज
फिर उगने को
कर प्रातः का संध्या-वंदन ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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