आज मैं फिर से अपने अत्यंत प्रिय हिंदी गीत कवि स्वर्गीय किशन सरोज जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय किशन सरोज जी का यह नवगीत–

बाँह फैलाए खड़े, निरुपाय, तट के वृक्ष हम
ओ नदी ! दो चार पल, ठहरो हमारे पास भी ।
चान्द को छाती लगा —
फिर सो गया नीलाभ जल
जागता मन के अन्धेरों में —
घिरा निर्जन महल
और इस निर्जन महल के एक सूने कक्ष हम
ओ चमकते जुगनुओ ! उतरो हमारे पास भी ।
मोह में आकाश के —
हम जुड़ न पाए नीड़ से
ले न पाए हम प्रशंसा-पत्र —
कोई भीड़ से
अश्रु की उजड़ी सभा के, अनसुने अध्यक्ष हम
ओ कमल की पंखुरी ! बिखरो हमारे पास भी ।
लेखनी को हम बनाएँ
गीतवन्ती बांसुरी
ढूँढ़ते परमाणुओं की —
धुन्ध में अलकापुरी
अग्नि-घाटी में भटकते, एक शापित यक्ष हम
ओ जलदकेशा प्रिया ! संवरो हमारे पास भी ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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