क्यूँ इंतिहा-ए-होश को!

क्यूँ इंतिहा-ए-होश को कहते हैं बे-ख़ुदी,
ख़ुर्शीद ही की आख़िरी मंज़िल तो रात है|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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