नीग्रो गुलामों का स्वर्ग स्वप्न!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कुबेरनाथ राय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कुबेरनाथ राय जी की यह कविता–

भाइयों, वहाँ नहीं कंधे पर जुए हैं
न ताँबे के कड़े हैं न लोहे की हँसली है
न कमरबंधी शृंखला है न घाव है न घट्ठे हैं
भाइयों, वहाँ कोई ऐसा श्रृंगार नहीं।

भाइयों, वहाँ नहीं कोंचते पैने की नोक हैं
न सौ-सौ बेंतें हैं, न सपासप कोड़े हैं
न भूख ही अंतड़ियाँ चबाती हैं वहाँ
भाइयों, वहाँ कोई ऐसा दुलार नहीं।

भाइयों, वहाँ पर तो मौज है डेमोक्रेसी है
अह, रोटी के साथ नमक भी है, ईसामसीह भी है
और सबसे बढ़कर
नरम मन है कोंवर छोकरियाँ हैं, सांवले इशारे हैं

भाइयों, वहाँ कोई सरकार नहीं
भाइयों, वहाँ नहीं कंधे पर जुए हैं।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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