लो सुनी गई हमारी!

लो सुनी गई हमारी यूँ फिरे हैं दिन कि फिर से,
वही गोशा-ए-क़फ़स है वही फ़स्ल-ए-गुल का मातम|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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