इस अरण्य में पैदल!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री अनूप अशेष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

अनूप जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत–

झाड़ी पकती झरबेरी
पत्थर फूटे झरने
दिन आए है
पैदल चलकर
बीहड़ घाट उतरने ।

पके बाँस की रगड़
घास में आग फूटती है
बूढ़ी लकड़हारनी
भूखे-हाथ कूटती है

ऐसी नई व्यवस्था
जंगल
कौन जाए चरने ।

बाघ शेर तेंदुए बस्ती में
इस अरण्य में हम
चले कौन आँखों के रस्ते
खुले रास्ते कम
कोल भील के पाँव
कहाँ जाएँ
पेटों को धरने ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “इस अरण्य में पैदल!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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