आज एक नई रचना शेयर कर रहा हूँ,
आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा।

भावों के धनुष-बाण रहे अनछुए
बेमतलब ही हम अस्तंगत हुए।
थे कुछ तो अपना कहलाने वाले
जब-तब इस मन को बहलाने वाले
ऐसे एहसास सब दिवंगत हुए।
सभी दिशाएं कोई धुन गाती थीं
किसी भी बहाने लिपटी जाती थीं
कैसे ये दिन यूं बे-रंगत हुए।
नए रंग ले-लेकर दिन आएंगे
जैसा भी हो रोएंगे-गाएंगे
आगत के आगे हम शीश नत हुए।
जीवन तो हर हालत में जारी है
सुख की है या फिर दुख की बारी है
हुए कभी चैत्र, कभी भाद्रपद हुए।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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