आज फिर से मेरी एक पुरानी कविता प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

धागे तो कच्चे हैं, मनमोहक नारों के,
लेकिन जब जाल बुने जाते हैं यारों के,
और ये शिकारी, डालते हैं दाना,
हर रोज़ नए वादों का,
भाग्य बदल देने के
जादुई इरादों का,
फंसती है भोले कबूतर सी जनता तब,
जाल समेट, राजनैतिक बहेलिए
बांधते हैं, जन-गण की उड़ाने स्वच्छंद
और बनते हैं भाग्यविधाता-
अभिशप्त ज़माने के।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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