नज़रें नहीं या नज़ारा नहीं!

अपनी ज़ुल्फ़ों को रुख़ से हटा लीजिए मेरा ज़ौक़-ए-नज़र आज़मा लीजिए,
आज घर से चला हूँ यही सोच कर या तो नज़रें नहीं या नज़ारा नहीं|

क़मर जलालवी

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