अपना गुज़ारा नहीं!

ऐ मिरे हम-नशीं चल कहीं और चल इस चमन में अब अपना गुज़ारा नहीं,

बात होती गुलों तक तो सह लेते हम अब तो काँटों पे भी हक़ हमारा नहीं|

क़मर जलालवी

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