आज फिर से मेरी एक पुरानी रचना प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

रजनी गुज़र रही है, सुनसान रास्तों से
गोलाइयों में नभ की, जुगनू टंके हुए हैं।
हर चीज़ पर धुएं की,एक पर्त चढ़ गई है,
कम हो गए पथिक पर, पदचाप बढ़ गई है,
यह मोड़ कौन सा है, किस ओर जा रहा मैं,
यूं प्रश्न-चिह्न धुंधले, पथ पर लगे हुए हैं।
अब प्रश्न-चिह्न कल के, संदर्भ हो गए हैं,
कुछ तन ठिठुर- ठिठुरकर, निष्कंप सो गए हैं,
कितने बंटे हैं कंबल, अंकित है फाइलों में,
फुटपाथ के कफन पर, किसके गिने हुए हैं।
अब सो चुकी है जल में, परछाइयों की बस्ती,
चंदा ही खे रहा है, बस चांदनी की कश्ती,
चिथड़ों में गूंजती हैं, अब कर्ज़दार सांसें,
पर ब्याज के रजिस्टर, अब भी खुले हुए हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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