वो मिरे अशआ’र को !

थी ग़ज़ल मेरी बहुत बे-रब्त बे-कैफ़-ओ-असर,
वो मिरे अशआ’र को अलफ़ाज़-ओ-मा’नी दे गया|

नज़र कानपुरी

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