बचाते हम अपनी जान!

निगल गए सब की सब समुंदर ज़मीं बची अब कहीं नहीं है,
बचाते हम अपनी जान जिस में वो कश्ती भी अब कहीं नहीं है|

जावेद अख़्तर

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