ताज़गी अब कहीं नहीं है!

वो आग बरसी है दोपहर में कि सारे मंज़र झुलस गए हैं,
यहाँ सवेरे जो ताज़गी थी वो ताज़गी अब कहीं नहीं है|

जावेद अख़्तर

Leave a comment