सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

शेर जंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शेरजंग गर्ग जी का यह नवगीत–

सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए
सारे भरोसे छल गए
किरणें हमारे गाँव में
ख़ुशियाँ नहीं लाईं ।


महका नहीं मुरझा हृदय
चहकी नहीं कुछ ताज़गी
मानी नहीं, मानी नहीं
पतझर की नाराज़गी


मरते रहे, खपते रहे
प्रतिकूल धारों में बहे
लेकिन सफलता दो घड़ी
मिलने नहीं आई ।


अपना समय भी ख़ूब है
भोला सृजन जाए कहाँ
छल-छद्म तो स्वाधीन है
ईमान पर पहरा यहाँ


औ’ इस कदर गतिरोध पर
जग वृद्ध के गतिरोध पर
नाराज़ बिल्कुल भी नहीं
नादान तरुणाई ।


पर ख़ुदकुशी होगी नहीं
छाई रहे कितनी ग़मी
हर एक दुख के बाद भी
जीवित रहेगा आदमी


हर लड़खड़ाते गान को
गिरते हुए ईमान को
अक्षर किसी दिन थाम लेंगे
प्रेम के ढाई ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

2 responses to “सौ-सौ प्रतीक्षित पल गए!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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