आज फिर से प्रस्तुत है मेरा एक पुराना गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

तुम उजाड़ों से न ऊब जाओ कहीं
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
ये तिमिर से घिरी राजसी सीढ़ियां,
इनसे चढ़ती उतरती रही पीढ़ियां,
युग बदलते रहे,तंत्र गलते गए,
टूटती ही रहीं वंशगत रूढ़ियां।
था कभी जो महल, बन वही अब गया,
बेघरों के लिए है, बसेरा प्रिये।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
कल कहानी बना आज मेरे लिए
उस कहानी के संकेत मिलते यहाँ,
भूल जाते हैं जब अपना इतिहास हम
ठोकरें फिर पुरानी हैं पाते वहाँ,
अपने जीवन की उपलब्धियों की ध्वजा
मैं फिराता रहा हर डगर इसलिए।
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
आज की सप्तरंगी छटाएं सभी
एक दिन खंडहर ही कही जाएंगी,
देखकर नवसृजन की विपुल चंद्रिका
अपनी बदसूरती पर ये शरमाएंगी,
स्नेह की नित्य संजीवनी यदि न हो,
ज़िंदगी भी तो एक खंडहर है प्रिये,
मैं सजाता रहा खंडहर इसलिए।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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