हुए मर के हम जो!

हुए मर के हम जो रुस्वा हुए क्यूँ न ग़र्क़-ए-दरिया,
न कभी जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता।

मिर्ज़ा ग़ालिब

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