चुनाव!

आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि एवं संपादक स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

नंदन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कन्हैयालाल नंदन जी की यह कविता –

पहाड़ी के चारों तरफ
जतन से बिछाई हुई सुरंगों पर
जब लगा दिया गया हो पलीता
तो शिखर पर तनहा चढ़ते हुए इंसान को
कोई फर्क नहीं पड़ता
कि वह हारा या जीता।

उसे पता है कि
वह भागेगा तब भी
टुकड़े-टुकड़े हो जायेगा
और अविचल होने पर भी
तिनके की तरह बिखर जायेगा
उसे करना होता है
सिर्फ चुनाव
कि वह अविचल खड़ा होकर बिखर जाये
या शिखर पर चढ़ते-चढ़ते बिखरे-
टुकड़े-टुकड़े हो जाये।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “चुनाव!”

  1. कविता एक मुश्किल हालात के बारे में बताती है, जहाँ एक इंसान को एक तय किस्मत का सामना करना पड़ता है। खतरे से घिरे होने पर, जीतना या हारना अब मायने नहीं रखता, क्योंकि आखिर एक जैसा ही लगता है। बस एक ही चीज़ बची है कि इसका सामना कैसे करना है, यह चुनना है: डर के मारे भागना है या इज्ज़त के साथ डटे रहना है।

    यह मैसेज बताता है कि, भले ही हम नतीजा नहीं बदल सकते, हम अपना रवैया तय कर सकते हैं। यह हिम्मत, जागरूकता और मुश्किल हालात का सामना करते हुए ईमानदारी से चुनने के महत्व के बारे में बताता है।

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    1. बहुत सही व्याख्या की आपने जी, हार्दिक धन्यवाद।

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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