गिरफ़्त मौत की है!

ये किस ख़ता की सज़ा में हैं दोहरी ज़ंजीरें,
गिरफ़्त मौत की है ज़िंदगी की क़ैद में हूँ|

कृष्ण बिहारी नूर

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