आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री इसाक अश्क जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इसाक जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री इसाक अश्क जी का यह नवगीत –

हम जैसे लोगों का
ठौर क्या ?
ठिकाना क्या ?
भूख प्यास
पीड़ाओं ने
झिड़की दे-देकर पाला
हमसे है दूर
सुखद भोर का उजाला
यह कहने लिखने में
लाज क्या ?
लजाना क्या ?
पाँव मिले
भीलों जैसे अरूप
सौ भटकन वाले
इसी वज़ह
राजभवन से अक्सर
हम गए निकाले
यह सच है इसमें अब
झूठ क्या ?
बहाना क्या ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a comment