मय-कशी अब मिरी !

मय-कशी अब मिरी आदत के सिवा कुछ भी नहीं,
ये भी इक तल्ख़ हक़ीक़त के सिवा कुछ भी नहीं|

जाँ निसार अख़्तर

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