रात के आख़िर होते!

अव्वल-ए-शब वो बज़्म की रौनक़ शम्अ’ भी थी परवाना भी,
रात के आख़िर होते होते ख़त्म था ये अफ़्साना भी|

आरज़ू लखनवी

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