प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-
कुछ कुछ सिक्के तो डाले पर
गुल्लक अभी नहीं भर पाई।
यह गुल्लक मेरी कविता की
रोज मांगती है कुछ फुटकर
कवि की नित भंगिमा बनाना
मुझको लगता है अति दुष्कर,
कितना नया ढूंढकर लाऊं
इसकी भूख नहीं मिट पाई।
इसके अजब-गजब नखरे हैं
सीधा-सादा नहीं सुहाता
यह स्वीकार नहीं करती है
शब्द-अर्थ का प्रचलित नाता,
सदा चाहती यही कहें कुछ
लेकिन दे कुछ और सुनाई।
बहुत कहा कवि भी मनुष्य है
उसके अपने हैं कुछ झंझट
ऐसी बात कहाँ से लाए
जो स्वीकार करें सब झटपट
बेढंगे दायित्व सौंपते
इसको कभी दया कब आई।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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