पत्तों की तरह बे-दर्द!

छूटे न कभी फूलों का नगर कोशिश तो यही है अपनी मगर,
इक रोज़ उड़ा ले जाएगी पत्तों की तरह बे-दर्द हवा|

क़ैसर शमीम

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