शाम का गीत!

आज फिर से अपना एक पुराना नवगीत शेयर कर रहा हूँ, यह नवगीत अंतराल-4 में प्रकाशित हुआ था।

जला हुआ लाल कोयला
राख हुआ सूर्य दिन ढले।

होली सी खेल गया दिन
रीते घट लौटने लगे,
दिन भर के चाव लिए मन
चाहें कुछ बोल रस पगे,
महानगर में उंडेल दूध,
गांवों को दूधिए चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।


ला न सके स्लेट-पेंसिलें
तुतले आकलन के लिए,
सपनीले खिलौने नहीं
प्रियभाषी सुमन के लिए,
कुछ पैसे जेब में बजे
लाखों के आंकड़े चले।
राख हुआ सूर्य दिन ढले।।



आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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6 responses to “शाम का गीत!”

  1. बहुत सुंदर।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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