बारिश में घर लौटा कोई!

आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का यह नवगीत-

बारिश में घर लौटा कोई
      दर्पण देख रहा
      न्यूटन जैसे पृथ्वी का
      आकर्षण देख रहा ।

धान-पान-सी आदमकद
हरियाली लिपटी है,
हाथों में हल्दी पैरों में
लाली लिपटी है
      भीतर ही भीतर कितना
      परिवर्तन देख रहा ।


गीत-हँसी-संकोच-शील सब
मिले विरासत में
जो कुछ है इस घर में सब कुछ
प्रस्तुत स्वागत में


      कितना मीठा है मौसम का
      बंधन देख रहा ।


नाच रही है दिन की छुवन
अभी भी आँखों में,
फूलझरी-सी छूट रही है
वही पटाखों में
      लगता जैसे मुड़-मुड़ कोई
      हर क्षण देख रहा ।


दिन भर चाह रही होठों पर,
दिन भर प्यास रही
रेशम जैसी धूप रही
मखमल-सी घास रही
      आँख मूँदकर
      सुख
      सर्वस्व समर्पण देख रहा ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

2 responses to “बारिश में घर लौटा कोई!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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