जो ख़्वाबों में मिरे!

जो ख़्वाबों में मिरे आ कर तसल्ली मुझ को देती थी,
वो सूरत अब नज़र आती नहीं मैं कैसे सो जाऊँ|

अनवर मिर्ज़ापुरी

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