जब तक है दिलों में!

जब तक है दिलों में सच्चाई सब नाज़-ओ-नियाज़ वहीं तक हैं
जब ख़ुद-ग़र्ज़ी आ जाती है जुल होते हैं घातें होती हैं

आरज़ू लखनवी

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