आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
मालवीय जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत-

रातें लम्बी हुईं
दिन बौने हो गए ।
ठिगने कद वाले दिन
लम्बी परछाइयाँ
धूप की इकाई पर
तिमिर की दहाइयाँ
रातें पत्तल हुईं
दिन दौने हो गए ।
कुहरों पर लिखी गई
विष भरी कहानियाँ
नीली पड़ने लगी
सुबह की जवानियाँ
रातें आँगन हुईं
दिन कौने हो गए ।
बर्फ़ीले ओठों पर
शब्द ठिठुरने लगे
नाकाफ़ी ओढ़ने
बिछौने जुड़ने लगे
रातें अजगर हुईं
दिन छौने हो गए ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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