शिकस्त-ए-ज़ुल्मत!

तुलू-ए-सुब्ह है नज़रें उठा के देख ज़रा,
शिकस्त-ए-ज़ुल्मत-ए-शब मुस्कुरा के देख ज़रा|

जाँ निसार अख़्तर

Leave a comment