ग़म-ए-जहाँ से भी!

ग़म-ए-बहार ओ ग़म-ए-यार ही नहीं सब कुछ,
ग़म-ए-जहाँ से भी दिल को लगा के देख ज़रा|

जाँ निसार अख़्तर

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