खिलखिला के कैसे!

तुम्ही बताओ कि मैं खिलखिला के कैसे हँसूँ,
कि रोज़ ख़ाना-ए-दिल से अलम* निकलते हैं|
*कष्ट
मुनव्वर राना

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