इन अंधेरी घाटियों के!

आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा- इन अंधेरी घाटियों के पार जाना हैवक़्त तो इसमें लगेगा । आज की दुनिया बहुत खूंख्वार लगती है, आदमीयत पर खिंचीतलवार लगती है, इस व्यवस्था का कोई उपचार लाना हैप्रेम क्या संभव करेगा। मानते जो स्वयं को सिरमौर दुनिया का,पालने में पालतेआतंक के … Continue reading इन अंधेरी घाटियों के!