भरी दुपहरी!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि, नवगीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

मिश्र जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –

भरी दुपहरी
मारी-मारी फिरे डाल पर
पतछाँही के लिए गिलहरी
भरी दुपहरी ।

उलटी धूपघड़ी की टिड्डी
चाट गई सब हरियल सपने
तलवे जले घाट धोबिन के
मरी सीपियाँ लगीं चमकने ।

भरी दुपहरी
सूखे का बैताल नाचता
हुई दिशाएँ अन्धी-बहरी
भरी दुपहरी ।

रुत के मारे हुए कुँओं के
माथे पर मकड़ों के जाले
झूठी-सच्ची आग लगाकर
दुबकी हवा कहीं परनाले ।


भरी दुपहरी
पानी-पानी चिल्लाती है
बेपर्दा हो नदिया गहरी
भरी दुपहरी ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “भरी दुपहरी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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