प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

विषय आज कुछ नहीं सूझता
फिर मौसम की बात करेंगे।
मौसम के हम नहीं नियंता
अक्सर उसके मारे रहते
कभी किसी हद तक भाता वह
कभी प्रभाव दुधारे रहते,
लेकिन उसके बारे में हम
कुछ तो तहकीकात करेंगे।
वैसे यह भी नहीं रहा अब
ऊपर वाले की मर्जी भर
कुछ माहौल बना देते हैं
धरती के भी प्रबल धनुर्धर
कितनी प्रकृति प्रभावित उनसे
यह सब भी हम ज्ञात करेंगे।
जैसा करना ही होता है
प्रभुओं. संप्रभुओं के गुण गाओ
लेकिन साथ-साथ मौसम में
अपना भी कुछ दखल बनाओ,
लोगों का क्या जहाँ शक्ति हो
नत उस दिशि सिर-माथ करेंगे।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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