जनाज़ा अपनी मर्ज़ी!

तुम्हारे बाद अब जिस का भी जी चाहे मुझे रख ले,
जनाज़ा अपनी मर्ज़ी से कहाँ कांधा बदलता है|

वसीम नादिर

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