ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ !

ख़िज़ाँ में चाक-गरेबाँ था मैं बहार में तू,
मगर ये फ़स्ल-ए-सितम-आश्ना किसी की नहीं|

अहमद फ़राज़

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